
त्वयि प्रभूतानि पदानि देहिनां,
पदं तदेकं तदपि प्रयच्छसि ।
समस्तशुक्लाऽपि सुवर्ण-विग्रहा,
त्वमत्र मात: कृतचित्रचेष्टिता ॥13॥
तुझमें हैं अनेक पद माता! किन्तु एक पद देती हो ।
पूर्णरूप से शुक्ला हो पर, तन सुवर्ण आश्चर्य अहो !
अन्वयार्थ : हे माता! यद्यपि तुझमें अनेक पद हैं तो भी तू जीवों को एक ही पद देती है तथा चारों ओर से अत्यन्त शुक्ल होने पर भी सुवर्ण-विग्रहा है, इस प्रकार संसार में आप आश्चर्यकारी चेष्टाओं को धारण करनेवाली हैं ।