+ भगवान की वाणी सुनने पर हर्ष की प्राप्ति -
समुद्रघोषाकृतिरर्हति प्रभौ,
यदा त्वमुत्कर्षुपागता भृशम् ।
अशेषभाषात्मतया त्वया तदा,
कृतं न केषां हृदि मातरद्भुतम् ॥14॥
अति उत्कर्ष प्राप्त कर प्रभु में, माता सागर-घोष समान
सब भाषामय रूप तुम्हारा, जन-जन को आश्चर्य महान॥
अन्वयार्थ : हे माता! जिस समय आप भगवान् अर्हन्त में अत्यन्त उत्कर्ष को प्राप्त हुई थीं अर्थात् समवसरण में भगवान् अर्हन्त के मुख से दिव्यध्वनि के रूप में प्रकट हुई थीं, उस समय आपकी ध्वनि, समुद्र के समान धीर-गम्भीर और अनेक भाषास्वरूप थी; जिसे देखकर किसके मन में आश्चर्य नहीं हुआ था ?