
सचक्षुरप्येष जनस्त्वया विना, यदन्ध एवेति विभाव्यते बुधै: ।
तदस्य लोकत्रितयस्य लोचनं, सरस्वति! त्वं परमार्थदर्शने ॥15॥
बिना आपके चक्षु सहित नर, को भी अन्ध कहें विद्वान ।
निश्चय से त्रिभुवन-दर्शन में, मात्र आप ही नेत्र समान॥
अन्वयार्थ : हे सरस्वती! आपके बिना इस पुरुष को नेत्रसहित होने पर भी विद्वान् लोग अन्धा ही समझते हैं, अत: तीन लोक के वास्तविक दर्शन हेतु आप ही अद्वितीय नेत्र हैं ।