+ जिनवाणी की कृपा से कवित्व एवं वक्तृत्व की प्राप्ति -
गिरा नरप्राणितमेति सारतां, कवित्ववक्तृत्वगुणे च सा च गी: ।
इदं द्वयं दुर्लभमेव ते पुन:, प्रसादलेशादपि जायते नृणाम् ॥16॥
जीवन सफल वचन से अरु, कवि-वक्तापन से वचन सफल ।
किन्तु आपकी कृपा मात्र से, दोनों गुण पा लेते नर॥
अन्वयार्थ : मनुष्य का जीवन, वाणी से सफल समझा जाता है तथा कवित्व एवं वक्तृत्व गुण के होने पर वाणी सारभूत समझी जाती हैŸ । इस संसार में कविपना एवं वक्तापना प्राप्त होना दुर्लभ है, किन्तु आपके थोड़े ही अनुग्रह से ये दोनों गुण सहज प्राप्त हो जाते हैं ।