
नृणां भवत्सन्निधिसंस्कृतं श्रवो, विहाय नान्यद्धितमक्षयं च तत् ।
भवेद्विवेकार्थमिदं परं पुन:, विमूढतार्थं विषयं स्वमर्पयत् ॥17॥
कान आपसे संस्कारित जो, वे ही अविनाशी हितकार ।
उनसे ही नर को विवेक हो, विषय-लीनता से कुविकार॥
अन्वयार्थ : हे सरस्वती माता! जिस कान का आपके समीप संस्कार किया गया है अर्थात् जो कान आपके सहवास से शुद्ध एवं पवित्र किया गया है, वही कान, हित को करनेवाला तथा अविनाशी है; किन्तु उससे भिन्न कान, न हितकारी है और न अविनाशी है । आपके सहवास से पवित्र कान ही मनुष्यों में विवेक के लिए होते हैं; किन्तु उससे भिन्न विषयों की ओर झुकता हुआ कान, विवेक के लिए नहीं; अपितु विशेषरूप से मूढता के लिए होता है ।