
कृतापि ताल्वोष्ठपुटादिभिर्नृणां,
त्वमादिपर्यन्तविवर्जितस्थिति: ।
इति त्वयापीदृशधर्मयुक्तया,
स सर्वथैकान्तविधिर्विचूर्णित: ॥18॥
तालु-ओष्ठ-पुटों से जन्मी, माता! किन्तु अनादि-अनन्त ।
उभय धर्म संयुक्त किया, एकान्तवाद का तुमने अन्त॥
अन्वयार्थ : हे सरस्वती माता! यद्यपि तू मनुष्यों के तालु तथा ओष्ठ-पुटों से उत्पन्न हुई है, तथापि तेरी स्थिति, आदि-अन्त से रहित है; अत: ऐसे धर्मों से संयुक्त हे सरस्वती! तूने सर्वथा एकान्त मार्ग का नाश कर दिया है - ऐसा भली-भाँति प्रतीत होता है ।