
अपि प्रयाता वशमेकजन्मनि, द्युधेनुचिन्तामणिकल्पपादपा: ।
फलन्ति हि त्वं पुनरत्र चापरे, भवे कथं तैरुपमीयसे बुधै: ॥19॥
कामधेनु-चिन्तामणि-सुरतरु, एक जन्म में फल दायक ।
उभय जन्म में फल देती माँ, अत: नहीं उपमा लायक॥
अन्वयार्थ : हे सरस्वती! पुण्योदय से प्राप्त कामधेनु, चिन्तामणि तथा कल्पवृक्ष एक ही भव में मनुष्यों को इष्ट फल देते हैं, किन्तु आप इस भव तथा परभव, दोनों में मनुष्यों को इष्ट फल देनेवाली हो; इसलिए आपको कामधेनु आदि की उपमा कभी भी नहीं दी जा सकती है ।