
अगोचरो वासरकृन्निशाकृतो:, जनस्य यच्चेतसि वर्तते तम: ।
विभिद्यते वागधिदेवते त्वया, त्वमुत्तमज्योतिरिति प्रगीयसे ॥20॥
सूर्य-चन्द्र भी देख सकें नहिं, मोह-तिमिर जन-मन में व्याप्त ।
माता! तू ही मोह-विनाशक, उत्तम ज्योति कहते आप्त॥
अन्वयार्थ : हे वागधिदेवते! हे सरस्वती! जो अन्धकार, सूर्य तथा चन्द्रमा के भी गोचर नहीं है अर्थात् जिस अन्धकार को न सूर्य देख सकता है और न चन्द्रमा देख सकता है - ऐसे मनुष्यों के चित्त में विद्यमान अन्धकार का तू नाश करती है; इसलिए इस संसार में तू ही उत्तम ज्योति है - ऐसा विद्वान् मनुष्य, तेरा गुण-गान करते हैं ।