+ मनुष्य के चित्त को आनन्द देनेवाली माता जिनवाणी -
जिनेश्वर-स्वच्छ-सर:सरोजिनी,
त्वमंग-पूर्वादि-सरोज-राजिता ।
गणेश-हंस-व्रज-सेविता सदा,
करोषि केषां न मुदं परामिह ॥21॥
मात! कमलिनी जिनवर सर की, शोभित द्बादश अंग कमल ।
शोभित हो गणधर समूह से, जग में किसे न हर्ष विमल॥
अन्वयार्थ : हे माता सरस्वती! आप जिनेश्वररूपी निर्मल सरोवर की कमलिनी और ग्यारह अंग चौदह पूर्वरूपी कमल से सुशोभित हो, गणधररूपी हंसों के समूह से सेवित हो; इसलिए आप इस संसार में किसे उत्तम हर्ष की करनेवाली नहीं हो? अर्थात् अवश्य हो ।