+ आपकी भक्ति से सम्यग्ज्ञान (श्रुतज्ञान) की प्राप्ति -
त्वदंघ्रि-पद्म-द्वय-भक्ति-भाविते,
तृतीयमुन्मीलति बोधलोचनम् ।
गिरामधीशे सह केवलेन यत्,
समाश्रितं स्पर्धमिवेक्षतेऽखिलम् ॥23॥
तेरे चरण-कमल की भक्ति, खोले तीजा नेत्र सुजान ।
सकल-बोध से होड़ लगाके, सब जग देखे वह श्रुतज्ञान॥
अन्वयार्थ : हे माता सरस्वती! जो भव्य मनुष्य, आपके दोनों चरण-कमलों की भक्ति तथा सेवा करता है, उस मनुष्य के तीसरा सम्यग्ज्ञानरूपी नेत्र प्रगट होता है । यह सम्यग्ज्ञानरूपी नेत्र, केवलज्ञान के साथ ईर्ष्या करके ही मानों समस्त पदार्थों को देखता-जानता है ।