
त्वमेव तीर्थं शुचिबोधवारिमत्,
समस्त-लोकत्रय-शुद्धिकारणम् ।
त्वमेव चाऽऽनन्द-समुद्र-वर्धने,
मृगांकमूर्ति: परमार्थदर्शिनाम् ॥24॥
तुम्हीं तीर्थ शुचि ज्ञान-नीरमय, त्रिभुवन को भी शुद्ध करो ।
तुम्हीं चन्द्र परमार्थ-दर्शि के, सुख-समुद्र में वृद्धि करो॥
अन्वयार्थ : हे माता सरस्वती! सम्यग्ज्ञानरूपी जल से भरा हुआ तथा समस्त लोकों की शुद्धि का कारण तू ही पवित्र तीर्थ है तथा जो पुरुष, परमार्थ को देखनेवाले हैं, उन मनुष्यों के आनन्दरूपी समुद्र को बढ़ाने में तू ही चन्द्रमा है ।