+ समस्त ज्ञानों की प्राप्ति में जिनवाणी ही कारण -
त्वयादिबोध: खलु संस्कृतो व्रजेत्,
परेषु बोधेष्वखिलेषु हेतुताम् ।
त्वमक्षि पुंसामतिदूरदर्शने,
त्वमेव संसारतरो: कुठारिका ॥25॥
तुमसे हुआ पवित्र ज्ञान-मति, अन्य ज्ञान का कारण है ।
तुम्हीं दूरदर्शन में चक्षु, भव-तरु हेतु कुठार कहें॥
अन्वयार्थ : हे वागधिदेवते! हे सरस्वती! आपके द्वारा अत्यन्त पवित्र किया हुआ मतिज्ञान ही समस्त श्रुत एवं मन:पर्यय आदि ज्ञानों में कारण है । अत्यन्त दूर की वस्तु देखने में तू ही मनुष्य का नेत्र है और संसाररूपी वृक्ष को काटने के लिए तू ही कुठार है ।