+ जिनवाणी की कृपा से समस्त गुणों की प्राप्ति -
यथाविधानं त्वमनुस्मृता सती,
गुरूपदेशोऽयमवर्ण-भेदत: ।
न ता: श्रियस्ते न गुणा न तत्पदं,
प्रयच्छसि प्राणभृते न यच्छुभे ॥26॥
गुरु-वचनों से अकारादि में, तव स्मरण विधि-अनुसार ।
करें, उसे नहिं कौन लक्ष्मी गुण-पद देती आप कृपा॥
अन्वयार्थ : हे शुभे! हे सरस्वती! यह गुरु का उपदेश हैं कि जो पुरुष, शास्त्रानुसार अकारादि आदि से लेकर अन्त तक अथवा वर्ण भेद रहित आपका स्मरण करनेवाला है, उस पुरुष के लिए न तो कोई ऐसी लक्ष्मी है, जिसे आप न देवें और न कोई ऐसा उत्तम गुण तथा उत्तम पद ही है, जो कि आपकी कृपा से प्राप्त न हो सके ।