
अनेक-जन्मार्जित-पाप-पर्वतो, विवेक-वज्रेण स येन भिद्यते ।
भवद्वपु: शास्त्र-घनान्निरेति, सदर्थवाक्याऽमृतभारमेदुरात् ॥27॥
भव-भव में संचित अघ-गिरि को, तोड़ सके जो विवेक-वज्र ।
अर्थ-वाक्य अमृत-जलमय तव, तन-श्रुत मेघों से उत्पन्न॥
अन्वयार्थ : हे माता! हे सरस्वती! अनेक भवों में संचय किया हुआ पापरूपी पर्वत, जिस विवेकरूपी वज्र के द्वारा तोड़ा जाता है; वह विवेकरूपी वज्र, श्रेष्ठ अर्थ तथा वाक्यरूपी जल के भार से वृद्धि को प्राप्त होकर, आपके शरीररूप शास्त्ररूपी मेघ से उत्पन्न होता है ।