+ हे जिनवाणी! आपका तेज स्वयं प्रकाशित -
तमांसि तेजांसि विजित्य वाङ्मयं,
प्रकाशयद्यत्परमं महन्मह: ।
न लुप्यते तैर्न च तै: प्रकाश्यते,
स्वत: प्रकाशात्मकमेव नन्दतु ॥28॥
अन्य तेज अरु तिमिर जीतता, तव वाणी का तेज महान ।
अन्धकार से नष्ट न होता, स्वत: प्रकाशित तेज महान॥
अन्वयार्थ : हे माता! अन्धकार तथा अन्य तेजों को जीत कर, स्वत: प्रकाशित आपका दिव्यध्वनिरूप सर्वोत्कृष्ट तेज, इस लोक में जयवन्त प्रवर्तो । वह तेज, न तो अन्घकार से नष्ट होता है और न किसी दूसरे तेज से प्रकाशित होता है, किन्तु स्वत: प्रकाशस्वरूप ही है ।