+ जिनवाणी की कृपा से सबकी प्राप्ति -
तव प्रसाद: कवितां करोत्यत:,
कथं जडस्तत्र घटेत मादृश: ।
प्रसीद तत्रापि मयि स्वनन्दने,
न जातु माता विगुणेऽपि निष्ठुरा ॥29॥
तुम प्रसाद ही काव्य रचे, मुझसा जड़ कैसे रच सकता ?
माँ! निष्ठुर नहिं निर्गुण सुत पर, मुझ पर तू प्रसन्न हो जा !
अन्वयार्थ : हे सरस्वती माता! तेरा प्रसाद ही कविता करनेवाला है; इसलिए मेरे (ग्रन्थकर्ता के) समान वज्र मूर्ख, उस कविता को करने की चेष्टा कैसे कर सकता है? अत: इस कविता को करने में हे माता! तुम मुझ पर प्रसन्न हो क्योंकि यदि अपना पुत्र निर्गुणी हो तो भी माता कभी कठोर नहीं बनती ।