
इमामधीते श्रुत-देवता-स्तुतिं,
कृतिं पुान् यो मुनिपद्मनन्दिन: ।
स याति पारं कवितादिसद्गुण,
प्रबन्धसिन्धो: क्रमतो भवस्य च ॥30॥
पद्मनन्दि मुनिकृत श्रुत-स्तुति-पद जो नर निश-दिन पढ़ता ।
काव्यादिक गुण-सिन्धु-पार हो, भव-समुद्र को वह तिरता॥
अन्वयार्थ : जो पुरुष, मुनिवर श्री पद्मनन्दि द्वारा की गई श्रुतदेवता की स्तुतिरूप कृति को पढ़ता है, वह पुरुष, कवित्व आदि उत्तम गुणों के प्रबन्धरूपी समुद्र से तथा क्रम से संसाररूपी समुद्र के पार हो जाता है ।