+ अन्तिम उपसंहार -
(शार्द्रूलविक्रीडित)
कुण्ठास्तेऽपि वृहस्पतिप्रभृतयो, यस्मिन् भवन्ति ध्रुवं;
तस्मिन् देवि! तव स्तुतिव्यतिकरे, मन्दा नरा: के वयम् ।
तद्वाक्चापलमेतदश्रुतवतामस्माकमम्ब! त्वया;
क्षन्तव्यं मुखरत्वकारणमसौ, येनातिभक्तिग्रह: ॥31॥
सुरगुरु जैसे बुधजन भी, जिनकी स्तुति में हो मतिमन्द ।
उन सरस्वती मात की स्तुति, कैसे कर सकते हैं हम ?
हे माता! यह नहीं स्तवन, वाक्-चपलता है मेरी ।
अल्पश्रुत को क्षमा करो तुम, क्योंकि आपमें है भक्ति॥
अन्वयार्थ : हे देवी सरस्वती! जब, आपके स्तवन करने में बड़े-बड़े विद्वान् वृहस्पति आदि भी निश्चय से कुण्ठ अर्थात् मन्दबुद्धि हो जाते हैं; तब आपके स्तवन करने में हम जैसे मन्दबुद्धियों की बात ही क्या है? अर्थात् हम तो आपकी स्तुति कर ही नहीं सकते क्योंकि शास्त्र के अजानकार हमारी यह स्तुति नहीं, अपितु वाणी की चपलता है । इसलिए हे माता! हमारी इस वाचालता को क्षमा कीजिए क्योंकि आपमें ही हमारी अत्यन्त भक्ति है ।