
स्वयंभुवा येन समुद्धृतं जगत्, जडत्व-कूपे पतितं प्रमादत: ।
परात्मतत्त्वप्रतिपादनोल्लसत्, वचोगुणैरादिजिन: स सेव्यताम्॥1॥
अन्ध-कूप में पतित प्रमादी, जग का जो करते उद्धार ।
स्व-पर प्रकाशक वचनों से, उन आदि प्रभु को सेवो सार॥
अन्वयार्थ : हे भव्य जीवों! प्रमाद के वशीभूत होकर अज्ञानरूपी कुएं में पड़े हुए जगत् को जिन स्वयम्भू श्री आदिनाथ भगवान ने स्व-पर का स्वरूप कहनेवाले अपने वचनरूपी मनोहर गुणों से बाहर निकाला - ऐसे श्री आदिनाथ भगवान की हमें सेवा करनी चाहिए अर्थात् उपासना करनी चाहिए ।