+ श्री अजितनाथ तीर्थंकर की स्तुति -
भवारिरेको न परोऽस्ति देहिनां,
सुहृच्च रत्नत्रयमेकमेव हि ।
स दुर्जयो येन जिनस्तदाश्रयात्,
ततोऽजितान्मे जिनतोऽस्तु सत्सुखम् ॥2॥
रत्नत्रय ही मित्र जीव का, दुर्जय शत्रु है संसार ।
जिनने रत्नत्रय से बैरी, जीता अजितनाथ सुखकार॥
अन्वयार्थ : जीवों का एकमात्र वैरी यह संसार है और दूसरा कोई भी वैरी नहीं है तथा सम्यग्दर्शनादि रत्नत्रय इसके मित्र हैं और दूसरा कोई मित्र नहीं है । यह संसाररूपी वैरी अत्यन्त दुर्जय है, किन्तु श्री अजितनाथ भगवान ने सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान तथा सम्यक्चारित्ररूपी मित्र की सहायता से इस संसाररूपी भयंकर वैरी को सर्वथा जीत लिया है - ऐसे श्री अजितनाथ भगवान से मुझे भी श्रेष्ठ सुख मिले, यह प्रार्थना है ।