
पुनातु न: सम्भवतीर्थकृज्जिन:,
पुन: पुन: सम्भवदु:खदु:खिता: ।
तदर्ति: नाशाय विमुक्ति-वर्त्मन:,
प्रकाशकं यं शरणं प्रपेदिरे ॥3॥
पुन: पुन: भव-दु:ख से दु:खिया, जीवों के दु:ख के नाशार्थ ।
शरणभूत शिवमार्ग-प्रकाशक, सम्भव तीर्थंकर जिनराज॥
अन्वयार्थ : संसार-दु:खों का नाश करनेवाले तथा मोक्षमार्ग का प्रकाश करनेवाले जिनेन्द्र श्री सम्भवनाथ भगवान हमारी रक्षा करें, अत: श्री सम्भवनाथ भगवान को हम नमस्कार करते हैं ।