
निजै-र्गुणैरप्रतिमै र्हानजो,
न तु त्रिलोकी-जनताऽर्चनेन य: ।
यतो हि विश्वं लघु तं विमुक्तये,
नमामि साक्षादभिनन्दनं जिनम् ॥4॥
जो निजगुण से ही महान है, नहीं जगत् की पूजा से ।
अभिनन्दन जिन को वन्दन है, सकल विश्व है लघु जिनसे॥
अन्वयार्थ : हे अभिनन्दननाथ भगवान! तीन लोक के समस्त जीवों द्वारा पूजित होने से आप पूज्य नहीं, अपितु अपने स्वीय गुणों से श्रेष्ठ होने से आपको पूज्यपना प्राप्त हुआ है । जो जन्म-मरण से रहित हैं, जिनके ज्ञान के समक्ष समस्त लोक छोटा है अर्थात् जो सांसारिक सुखों को तुच्छ समझते हैं - ऐसे समस्त प्रकार का आनन्द देनेवाले श्री अभिनन्दननाथ जिनेन्द्र को मैं मस्तक झुका कर नमस्कार करता हूँ ।