
नय-प्रमाणादि-विधान-संघटं,
प्रकाशितं तत्त्वमतीव निर्मलम् ।
यतस्त्वया तत्सुतेऽत्र तावकं,
तदन्वयं नाम नमोऽस्तु ते जिन ॥5॥
नय-प्रमाण से संगत निर्मल, वस्तु-तत्त्व का किया प्रकाश ।
सुमति नाम सार्थक है जिनका, वन्दन सुमतिनाथ जिनराज॥
अन्वयार्थ : हे सुमतिनाथ जिनेन्द्र! जिसमें प्रमाण तथा नयों का भलीभाँति संघटन है और जो अत्यन्त निर्मल है - ऐसा तत्त्व आपने प्रकाशित किया है; अत: आपका नाम सार्थक है । हे जिनेश! आपको हमारा नमस्कार हो ।