+ श्री पद्मप्रभ तीर्थंकर की स्तुति -
रराज पद्मप्रभतीर्थकृत्सद-,
स्यशेष-लोक-त्रय-लोक-मध्यग: ।
नभस्युडुव्रातयुत: शशी यथा,
वचोऽमृतैर्वर्षति य: स पातु न: ॥6॥
सकल जगत् के मध्य सुशोभित, आनन्दामृत बरसाते ।
नभ में चन्द्र समान पद्मप्रभ, जिनवर को वन्दन करते॥
अन्वयार्थ : जिस प्रकार आकाश में चन्द्रमा, नक्षत्रों से शोभित होता है तथा जीवों के लिए आनन्दामृत का वर्षाव करता है; उसी प्रकार श्री पद्मप्रभ भगवान, समवसरण सभा में तीनों लोक के समस्त जीवों के बीच में शोभित होकर, आप अपने वचनरूपी अमृत को वर्षानेवाले हैं - ऐसे श्री पद्मप्रभ भगवान हमारी रक्षा करें, उनको हमारा नमस्कार हैं ।