
नराऽमराऽहीश्वरऽपीडने जयी,
धृतायुधो धीरमना झषध्वज: ।
विनाऽपि शस्त्रैर्ननु येन निर्जितो,
जिनं सुपार्श्वं प्रणमामि सर्वदा ॥7॥
सुर-नरपीड़क आयुधधारक, धीर मीन-ध्वजधारक काम ।
बिना शस्त्र के जीता जिनने, प्रभु सुपार्श्व को करूँ प्रणाम॥
अन्वयार्थ : जो कामदेव, नरेन्द्र देवेन्द्र और फणीन्द्र को भी दु:ख देनेवाला है, जो अनेक शस्त्रों का धारक है, जिसका मन अत्यन्त धीर है और जिसकी मीन की ध्वजा है - ऐसे कामदेव को श्री सुपार्श्वनाथ जिनेन्द्र ने बिना शस्त्र के पल भर में ही जीत लिया है; अत: उन श्री सुपार्श्व भगवान को मैं सर्वदा मस्तक झुका कर नमस्कार करता हूँ ।