
शशिप्रभो वागमृतांशुभि: शशी,
परं कदाचिन्न कलंक-संगत: ।
न चापि दोषाकरतां ययौ यति:,
जयत्यसौ संसृतिपापनाशन: ॥8॥
वचनामृत किरणों से शशिसम, चन्द्रप्रभ में नहीं कलंक ।
दोषों को भी प्राप्त नहीं, जग-अघनाशक जिनवर जयवन्त॥
अन्वयार्थ : जो चन्द्रमा के समान होने पर भी कर्म-कलंक से रहित हैं, अमृत की किरणों से युक्त है अर्थात् कभी भी दोषों को प्राप्त नहीं हुए हैं - ऐसे समस्त संसार के पापनाशक श्री चन्द्रप्रभ भगवान इस लोक में सदा जयवन्त रहें ।