
यदीय-पाद-द्वितय-प्रणामत:, पतत्यधो मोहन-धूलि-रंगिनाम् ।
शिरोगता मोह-ठक-प्रयोगत:, स पुष्पदन्त: सततं प्रणम्यते ॥9॥
मोह-ठग ने डाली सिर पर, मोहन-धूलि गिरे नीचे ।
जिनके चरण-कमल वन्दन से, पुष्पदन्त को नमन करूँ॥
अन्वयार्थ : संसारी प्राणियों के मस्तक में मोहरूपी ठग द्वारा स्थापित मोहन-धूलि, जिनके चरण-कमलों के प्रणाम मात्र से ही पल भर में नीचे गिर जाती है; उन श्री पुष्पदन्त भगवान को हमारा सदैव नमस्कार है । श्री पुष्पदन्त भगवान को नमस्कार करते हैं ।