+ श्री शीतलनाथ तीर्थंकर की स्तुति -
सतां सदीयं वचनं सुशीतलं,
यदेव चन्द्रादपि चन्दनादपि ।
तदत्र लोके भवतापहारि यत्,
प्रणम्यते किं न स शीतलो जिन: ॥10॥
चन्द्र और चन्दन से शीतल, वच जिनके बुध मानें ।
भवतपनाशक शीतल जिन को, क्यों न जगज्जन नमन करें॥
अन्वयार्थ : जिनके वचन, सज्जनों को चन्द्रमा तथा चन्दन से भी अधिक शीतल जान पड़ते हैं और जो समस्त संसार के तापनाशक हैं - ऐसे श्री शीतलनाथ भगवान क्या नमस्कार करने योग्य नहीं हैं?