
पादाब्ज-युग्मे तव वासुपूज्य तत्,
जनस्य पुण्यं प्रणतस्य तद्भवेत् ।
यतो न सा श्रीरिह हि त्रिविष्टपे,
न तत्सुखं यन्न पुर: प्रधावति ॥12॥
वासुपूज्य तव चरणों में नत, भविजन का हो पुण्य अपूर्व ।
जग में कौन लक्ष्मी या सुख, उससे रह सकता है दूर॥
अन्वयार्थ : हे वासुपूज्य जिनेश! जो भव्य, जीव आपके चरण-कमलों को नमस्कार करनेवाले हैं, उन भव्य जीवों को इस संसार में उस अपूर्व पुण्य की प्राप्ति होती है कि जिसकी कृपा से इन तीन लोक में ऐसी कोई लक्ष्मी नहीं है, जो आगे-आगे दौड़ कर इनके पास न आती हो और न कोई ऐसा सुख है, जो इन जीवों को प्राप्त न होता हो ।