+ श्री अनन्तनाथ तीर्थंकर की स्तुति -
अनन्त-बोधादिचतुष्टयात्मकं, दधाम्यनन्तं हृदि तद्गुणाशया ।
भवेद्यदर्थी ननु तेन सेव्यते, तदन्वितो भूरितृषेव सत्सर: ॥14॥
अनन्त चतुष्टयात्मक जिन! मम, उर में आशा उन गुण की ।
जिसका चाहक उसकी सेवा करे, यथा प्यासा सर की॥
अन्वयार्थ : अनन्त विज्ञानादि स्वरूप श्री अनन्तनाथ भगवान को उनके जैसे गुणों की प्राप्ति हेतु मैं अपने हृदय में धारण करता हूँ क्योंकि संसार में यह बात प्रत्यक्षगोचर है कि जो पुरुष, जिस गुण की प्राप्ति का इच्छुक होता है, वह मनुष्य उसकी ही सेवा करता है । जिसप्रकार अत्यन्त प्यासा मनुष्य, अपनी प्यास की शान्ति के लिए उत्तम (स्वच्छ जल से भरे हुए) सरोवर की ही सेवा करता है ।