
नमोऽस्तु धर्माय जिनायमुक्तये;
सुधर्म-तीर्थ-प्रविधायिने सदा ।
यमाश्रितो भव्यजनोऽतिदुर्लभां;
लभेत कल्याण-परम्परां पराम् ॥15॥
धर्म-प्रवर्तक धर्मनाथ जिन! को है मुक्ति हेतु वन्दन ।
जिनसे दुर्लभ उत्तम कल्याणों को प्राप्त करें वन्दन॥
अन्वयार्थ : जिन श्री धर्मनाथ भगवान का आश्रय कर के भव्य जीव, अत्यन्त दुर्लभ सर्वोत्कृष्ट कल्याणों की परम्परा को प्राप्त होते हैं, उस श्रेष्ठ धर्मतीर्थ को प्रवर्तानेवाले तथा अष्ट कर्मों को जीतनेवाले श्री धर्मनाथ भगवान को मैं मोक्ष की प्राप्ति के लिए सर्वदा नमस्कार करता हूँ ।