
विधाय कर्म-क्षयमात्म-शान्तिकृत्
जगत्सु य: शान्तिकरस्ततोऽभवत् ।
इति स्वमन्यं प्रति शान्ति-कारणं;
नमामि शान्तिं जिनमुन्नतश्रियम् ॥16॥
कर्मक्षय से आत्मशान्ति कर, सकल जगत् में शान्ति करें ।
स्व-पर शान्तिप्रदायक चक्री, शान्ति जिन! हम नमन करें॥
अन्वयार्थ : जो अपनी आत्मा की शान्ति करनेवाले हैं तथा समस्त कर्मों का क्षय करके सम्पूर्ण जगत् को शान्ति देनेवाले हैं । जो स्व-पर को शान्ति देनेवाले और अन्तरङ्ग-बहिरङ्ग दोनों प्रकार की लक्ष्मी के स्वामी हैं - ऐसे सोलहवें तीर्थंकर श्री शान्तिनाथ भगवान को मैं मस्तक झुका कर नमस्कार करता हूँ; समस्त जगत् को शान्ति देनेवाले ऐसे श्री शान्तिनाथ भगवान मुझे भी शान्ति प्रदान करें ।