+ श्री कुन्थुनाथ तीर्थंकर की स्तुति -
दयाङ्गिनां चिद् द्वितयं विमुक्तये,
परिग्रह-द्वन्द्व-विमोचनेन तत् ।
विशुद्धमासीदिह यस्य मादृशां,
स कुन्थुनाथोऽस्तु भवप्रशान्तये ॥17॥
शुद्ध हुए परिग्रह तजने से, जिनके दया और चिद्भाव ।
हम जैसों को शान्तिप्रदायक, होवें कुन्थुनाथ भगवान॥
अन्वयार्थ : बाह्य तथा अभ्यन्तर के भेदवाले समस्त परिग्रहों को छोड़ने के कारण श्री कुन्थुनाथ भगवान का समस्त प्राणियों पर दयाभाव और उनका अपना चैतन्यभाव - ये दोनों ही विशुद्ध हो गये हैं - ऐसे श्री कुन्थुनाथ भगवान, संसार के मनुष्यों को शान्ति-प्रदाता होवें ।