
विभान्ति यस्यांघ्रि-नखा नमत्सुर-,
स्फुरच्छिरोरत्नमहोऽधिक-प्रभा: ।
जगद्-गृहे पाप-तमो-विनाशिना:,
इव प्रदीपा: स जिनो जयत्यर: ॥18॥
नत देवों के मुकुट रत्न की, कान्ति से भी प्रभा महान ।
पाप-तिमिर-क्षय हेतु चरण-नख, अर जिनवर जग में जयवन्त॥
अन्वयार्थ : नमस्कार करते हुए देवताओं के मस्तकों पर शोभित मुकुटों में लगे हुए दैदीप्यमान रत्नों की कान्ति से भी अधिक प्रभावाले श्री अरनाथ जिनेन्द्र के चरणों के नख, संसाररूपी घर में पापरूपी अन्धकार का नाश करनेवाले दीपकों के समान शोभित होते हैं - ऐसे श्री अरनाथ भगवान इस लोक में जयवन्त हैं ।