
सुहृत्सुखी स्यादहित: सुदु:खित:,
स्वतोऽप्युदासीनतमादपि प्रभो: ।
यत: स जीयाज्जिनमल्लिरेकतां,
गतो जगद्विस्यमयकारिचेष्टित: ॥19॥
भक्त सुखी अरु शत्रु दु:खी, पर स्वयं उदास रहें भगवान् ।
विस्मयकारी चेष्टा जिनकी, जयवन्तो जिन मल्लि सुनाथ॥
अन्वयार्थ : यद्यपि श्री मल्लिनाथ भगवान, स्वयं अत्यन्त उदासीन हैं; तथापि उनके स्नेही भक्त, सुख पाते हैं तथा उनके शत्रु, दु:ख पाते हैं - ऐसे आत्मस्वरूप में लीन तथा समस्त जगत् को आश्चर्य करनेवाली चेष्टाओं को धारण करनेवाले श्री मल्लिनाथ भगवान, सदा इस लोक में जयवन्त वर्तें ।