+ श्री मुनिसुव्रतनाथ तीर्थंकर की स्तुति -
विहाय नूनं तृणवत्स्वसम्पदं, मुनिर्व्रतैर्योऽभवदत्र सुव्रत: ।
जगाम तद्धाम विरामवर्जितं, सुबोधदृङ्मे स जिन: प्रसीदतु॥20॥
तृणवत् सम्पत्ति तज कर, मुनि-व्रत धार, नाम सुव्रत सार्थक ।
हों प्रसन्न दृग-ज्ञान सुशोभित, शिवपद प्राप्त मुनिसुव्रत॥
अन्वयार्थ : जो श्री सुव्रतनाथ मुनि (श्री मुनिसुव्रतनाथ भगवान्) निश्चय से समस्त पदार्थों को तृण के समान छोड़ कर, व्रतों को धारण करने से सुव्रत नाम को धारण करते हैं । जो अविनाशी मोक्षपद को प्राप्त हुए हैं तथा जो सम्यग्दर्शन-सम्यग्ज्ञान के धारी हैं - ऐसे श्री मुनिसुव्रतनाथ भगवान मेरे लिए प्रसन्न हों ।