+ श्री नमिनाथ तीर्थंकर की स्तुति -
परं पराऽऽयत्ततयाऽति-दुर्बलं,
चलं स्वसौख्यं यदसौख्यमेव तत् ।
अद: प्रमुच्यात्मसुखे कृतादरो,
नमिर्जिनो य: स ममास्तु मुक्तये ॥21॥
पराधीन अरु दुर्बल चञ्चल, इन्द्रिय-सुख जाना दु:खरूप ।
उसे त्याग आतमसुख पीते, नमि जिन मुझको हों सुखरूप॥
अन्वयार्थ : हे नमिनाथ भगवान! आपने अत्यन्त पराधीनता से प्राप्त, स्वरूप से भिन्न, अत्यन्त दुर्बल तथा चंचल - ऐसे इन्द्रियों से उत्पन्न हुए सुख को दु:खस्वरूप मान कर, इन्द्रिय-सम्बन्धी समस्त सुख को छोड़ दिया है तथा आत्म सम्बन्धी सुख में आदर किया हैं - ऐसे श्री नमिनाथ भगवान, मुझे मुक्ति की प्राप्ति कराएँ ।