+ श्री नेमिनाथ तीर्थंकर की स्तुति -
अरिष्ट-संकर्तन-चक्र-नेमिता-
मुपागतो भव्य-जनेषु यो जिन: ।
अरिष्टनेमिर्जगतीतिविश्रुत:,
स ऊर्जयन्ते जयतादित: शिवम् ॥22॥
भविजन के अघ-नाश हेतु, जो चक्र-धार को प्राप्त हुए ।
जग-विख्यात अरिष्टनेमि प्रभु, ऊर्जयन्त से शिव पहुँचे॥
अन्वयार्थ : संसार में अरिष्टनेमि नाम से प्रसिद्ध जो भगवान, भव्य जनों के अशुभ कर्मों के नाश करने में चक्र की धार के समान हैं तथा जो गिरनार पर्वत से मोक्ष को पधारे हैं - वे श्री अरिष्टनेमि भगवान, इस लोक में सदा जयवन्त रहें ।