
यदूर्ध्व-देशे नभसि क्षणादहि,
प्रभो: फणा-रत्नकरै: प्रधावितम् ।
पदातिभिर्वा कमठाऽऽहते: कृते,
करोतु पार्श्व: स जिनो ममामृताम् ॥23॥
शेषनाग-फण रत्न-किरण की, सेना शोभित जिनके शीश ।
कमठासुर के नाश हेतु मम, मोक्ष-प्रदायक पारस ईश॥
अन्वयार्थ : हे पार्श्वनाथ भगवान! आकाश में कमठासुर को मारने के लिए आपके मस्तक पर शेषनाग के फण में लगी हुई रत्नों की किरणें पदाति के समान धावा करती हैं - ऐसे श्री पार्श्वनाथ भगवान, मेरे लिए मोक्ष को देवें ।