
त्रिलोक-लोकेश्वरतां गतोऽपि य:,
स्वकीय-कायेऽपितथापि नि:स्पृह: ।
स वर्धानोऽन्त्यजिनो नताय मे,
ददातु मोक्षं मुनि-पद्मनन्दिने ॥24॥
तीन लोक के स्वामी हैं, पर निज-तन से भी निस्पृह हैं ।
चरणों में नत पद्मनन्दि को, वर्द्धमान जिन! शिवपद दें॥
अन्वयार्थ : जो तीन लोक के ईश्वर होने पर भी अपने शरीर से अत्यन्त नि:स्पृह हैं - ऐसे अन्तिम जिनेन्द्र श्री वर्धान स्वामी, नमस्कार करते हुए मुझ पद्मनन्दि मुनि को मोक्ष प्रदान करें ।