
नि:शेषावरणद्वय-स्थिति-निशा, प्रान्तेऽन्तराय-क्षयो;
द्योते मोह-कृते गते च सहसा, निद्राभरे दूरत: ।
सम्यग्ज्ञान-दृगक्षि-युग्ममभितो, विस्फारितं यत्र तत्;
लब्धं यैरिह सुप्रभातमचलं, तेभ्यो यतिभ्यो नम: ॥1॥
मोह-नींद का भार दूर, होने पर प्रगटा ज्ञान-प्रकाश ।
ज्ञान-दर्शनावरण निशा का, अन्त और विघ्नों का नाश॥
जिस प्रभात में समीचीन वे, दर्श-ज्ञानद्वय नेत्र खुलें ।
उसे प्राप्त कर लिया जिन्होंने, उन यति को हम नमन करें॥
अन्वयार्थ : दोनों नि:शेषावरण अर्थात् ज्ञानावरण और दर्शनावरण की स्थितिरूप रात्रि के अन्त होने पर, अन्तराय कर्म के क्षय से प्रकाश होने पर और मोहनीय कर्म के द्वारा किए हुए निद्रा के भार से शीघ्र ही दूर होने पर; जिस सुप्रभात में सम्यग्ज्ञान तथा सम्यग्दर्शनरूप दोनों नेत्र उन्मीलित हुए है, उस अचल सुप्रभात को जिन यतियों ने प्राप्त कर लिया है - उन यतियों को नमस्कार है ।