+ प्रभातकालीन सूर्य के समान केवलज्ञान -
यत्सच्चक्र-सुख-प्रदं यदमलं, ज्ञान-प्रभा-भासुरं;
लोकाऽलोक-पद-प्रकाशन-विधि,-प्रौढ़ं प्रकृष्टं सकृत् ।
उद्भूते सति यत्र जीवितमिव, प्राप्तं परं प्राणिभि:;
त्रैलोक्याऽधिपतेर्जिनस्य सततं, तत्सुप्रभातं स्तुवे ॥2॥
जीवों को जो सुखप्रद निर्मल, ज्ञान-प्रभा से चमक रहा ।
लोकालोक-प्रकाशक उत्कट, एक बार यदि उदित हुआ॥
तो जग के प्राणी सर्वोत्तम, जीवन का अनुभव कर लें ।
हम त्रिभुवन-नायक जिनवर का, सुप्रभात स्तोत्र रचें॥
अन्वयार्थ : तीन लोक के स्वामी श्री जिनेन्द्र भगवान के उस सुप्रभात (केवलज्ञान) को मैं नमस्कार करता हूँ कि जो सुप्रभात समस्त जीवों को सुख देनेवाला है, समस्त प्रकार के मलों से रहित अमल ज्ञान की प्रभा से दैदीप्यमान है, समस्त लोकालोक को प्रकाशित करनेवाला है, जो अत्यन्त महान है और जिसके एक बार उदित होने पर समस्त प्राणियों को ऐसा लगता है कि हमें उत्कृष्ट जीवन की प्राप्ति हो गई है अर्थात् वे अपना जीवन धन्य समझते हैं ।