
एकान्तोद्धत-वादि-कौशिक-शतै:, नष्टं भयादाकुलै:;
जातं यत्र विशुद्ध-खेचर-नुति-,व्याहारकोलाहलम् ।
यत्सद्धर्म-विधि-प्रवर्तन-करं, तत्सुप्रभातं परं;
मन्येऽर्हत्परमेष्ठिनो निरुपमं; संसार-सन्ताप-हृत् ॥3॥
अर्हन्तों का भवताप-नाशक, अनुपम सुप्रभात प्रगटे ।
भयाकुलित एकान्तवाद के, शत-शत उल्लू नष्ट हुए॥
जो विशुद्ध विद्याधर-स्तवन, कोलाहल से गूँज रहा ।
वह महान सुप्रभात परम, सत्धर्म प्रवर्तन नित करता॥
अन्वयार्थ : श्री अर्हन्त भगवान के उपमारहित सुप्रभात के होने पर, एकान्त सिद्धान्त से मत्त सैंकड़ों वादीरूपी कौशिक भयभीत होकर नष्ट हो जाते हैं - ऐसा यह सुप्रभात अर्थात् अत्यन्त शुद्ध विद्याधरों की स्तुतिरूप शब्दों के कोलाहल से युक्त उत्तम धर्म की प्रवृत्ति करनेवाला तथा समस्त संसार के सन्ताप को दूर करनेवाला है ।