
सानन्दं सुर-सुन्दरीभिरभित:, शक्रैर्यदागीयते;
प्रात: प्रातरधीश्वरं यदतुलं, वैतालिकै: पठ्यते ।
यच्चाश्रावि नभश्चरैश्च फणिभि:, कन्याजनाद् गायत:;
तद्वन्दे जिन-सुप्रभातमखिलं, त्रैलोक्य-हर्ष-प्रदम् ॥4॥
सुरपति एवं देव-देवियाँ, आनन्दित हो करें सुगान ।
बन्दीजन भूपति के सन्मुख, प्रात:काल करें गुनगान॥
नाग-सुता गाती मधु स्वर में, सुनते विद्याधर नागेन्द्र ।
ऐसे त्रिभुवन आनन्द-दायक, प्रभु-स्तवन को करूँ नमन॥
जिनेन्द्र भगवान के सुप्रभात का गान, अत्यन्त आनन्दपूर्वक समस्त
अन्वयार्थ : देवांगनाएँ तथा इन्द्र, स्तुतिरूप से गाकर करते हैं; अनुपमेय इस सुप्रभात स्तोत्र को बन्दीजन, प्रात:काल राजाओं के सामने पढ़ते हैं तथा नाग-कन्याओं द्वारा गाये हुए इस स्तोत्र को विद्याधर तथा नागेन्द्र सुनते हैं । इस प्रकार तीनों लोक को हर्ष प्रदान करनेवाले भगवान के सुप्रभात स्तोत्र को मैं शिर नवाकर नमस्कार करता हूँ ।