
उद्योते सति यत्र नश्यति तरां, लोकेऽघ-चौरोऽचिरं;
दोषेशोऽन्तरतीव यत्र मलिनो, मन्द-प्रभो जायते ।
यत्राऽनीति-तमस्ततेर्विघटनात्, जाता दिशो निर्मला;
वन्द्यं नन्दतु शाश्वतं जिनपते:, तत्सुप्रभातं परम् ॥5॥
जिस मंगल प्रभात से जग के, पाप-चोर का होता अन्त ।
दोष-ईश मन-मोह-चन्द्र की, कान्ति भी होती है मन्द॥
विनशे तिमिर-अनीति अत:, हो जाती सभी दिशाएँ स्वच्छ ।
वन्दनीय परम जिनवर का, सुप्रभात जग में जयवन्त॥
अन्वयार्थ : श्री जिनेन्द्र भगवान के सुप्रभातस्तोत्र का प्रकाश होने पर संसार में पापरूपी चोर सर्वथा नष्ट हो जाते हैं, मनरूपी चन्द्रमा मलिन मन्दप्रभ हो जाता है तथा अनीतिरूपी अन्धकार के सर्वथा नष्ट हो जाने के कारण समस्त दिशाएँ स्वच्छ हो जाती हैं - ऐसा जिनेन्द्र भगवान का उत्कृष्ट, सदैव विद्यमान, वन्दनीक सुप्रभात स्तोत्र इस लोक में जयवन्त प्रवर्तो ।