+ अनेक दु:खों से दु:खी मुझ दीन पर दया की प्रार्थना -
निर्विण्णोऽहं नितरा-,मर्हन्! बहु-दु:खया भव-स्थित्या ।
अपुनर्भवाय भवहर!, कुरु करुणामत्र मयि दीने ॥2॥
बहु दु:खदायक भव-स्थिति से, खिन्न सर्वथा मैं अर्हन्त ।
करो दीन पर ऐसी करुणा, पुन: न होवे मेरा जन्म॥
अन्वयार्थ : हे समस्त घाति कर्मों को जीतनेवाले भगवान! अनेक प्रकार के दु:खों को देनेवाली जो यह संसार-स्थिति है, उससे मैं सर्वथा खिन्न हूँ, इसलिए हे संसारनाशक जिनेन्द्र! इस संसार में मुझ दीन पर ऐसी दया कीजिए, जिससे मुझे फिर से जन्म न धारण करना पड़े अर्थात् मैं मुक्त हो जाऊँ ।