
उद्धर मां पतितमतो, विषमाद्भव-कूपत: कृपां कृत्वा ।
अर्हन्नलमुद्धरणे, त्वमसीति पुन: पुन: वच्मि ॥3॥
मैं संसार-कूप में डूबा, कृपा करो मेरा उद्धार ।
हे प्रभु! इसमें सक्षम तुम ही, विनती करता बारम्बार॥
अन्वयार्थ : हे प्रभो! मैं इस भयंकर संसाररूपी कुएँ में पड़ा हुआ हूँ, इसलिए मुझ पर दया करके इस संसाररूपी भयंकर कुएँ से मुझे बाहर निकालें क्योंकि हे अर्हन्! इस कूप से मुझे निकालने में केवल आप ही समर्थ हैं - ऐसा मैं बार-बार आपकी सेवा में निवेदन करता हूँ ।