
त्वं कारुणिक: स्वामी, त्वमेव शरणं जिनेश! तेनाहम् ।
मोह-रिपु-दलितमान:, पूत्कारं तव पुर: कुर्वे ॥4॥
जग में तुम ही करुणासागर, भव्य जीव को शरणागार ।
मोह-शत्रु से अपमानित मैं, रो-रो करके करूँ पुकार॥
अन्वयार्थ : हे जिनेश! हे प्रभो! यदि संसार में दयावान हैं तो आप ही हैं और भव्य जीवों को एकमात्र शरण आप ही हैं, इसलिए मोहरूपी वैरी ने जिसका मान नष्ट कर दिया है - ऐसा मैं, आपके सामने ही पूत्कार करता हूँ अर्थात् फफक-फफक कर रोता हूँ ।