+ हे! तीन भुवन के स्वामी, दु:ख मेटो अन्तर्यामी -
ग्राम-पतेरपि करुणा, परेण केनाऽप्युपद्रुते पुंसि ।
जगतां प्रभोर्न किं तव, जिन मयि खलकर्मभि: प्रहते ॥5॥
कोई पीड़ित हो तो उस पर, ग्राम-पति भी करे दया ।
तुम त्रिभुवनपति मैं विधि-पीड़ित, मुझ पर क्यों न करो करुणा॥
अन्वयार्थ : जो मनुष्य, जिस गाँव का अध्यक्ष (मुखिया) होता है, यदि उस गाँव में किसी मनुष्य पर कोई अन्य व्यक्ति आकर उपद्रव करे अर्थात् उसको दु:ख देवे तो उस ग्राम का मुखिया, उस दु:खित मनुष्य पर करुणा करता है; उसी प्रकार हे जिनेन्द्र! आप तो तीन लोक के प्रभु हैं और मुझे अत्यन्त दुष्ट कर्मों ने सता रखा है तो क्या आप मेरे ऊपर करुणा न करोगे?