
तव जिन! चरणाब्ज-युगं,करुणामृत-सङ्ग-शीतलं यावत् ।
संसाराऽऽतप-तप्त:, करोमि हृदि तावदेव सुखी ॥7॥
जब तक करुणामृत से शीतल, हे प्रभु! तेरे चरण-कमल ।
भवाताप से तप्त हृदय में, बसे तभी तक सुख अविचल॥
अन्वयार्थ : हे देव! मैं संसाररूपी आतप से सन्तप्त हूँ । जब तक मैं आपके दयारूपी जल से युक्त अत्यन्त शीतल चरण-कमलों को हृदय में धारण करता हूँ, तब तक ही सुखी हूँ ।